Breaking

Search This Blog

Wednesday, October 10, 2018

नवरात्रि (2018) नौ देवी के अवतार, पूजा विधि और मंत्र सम्पूर्ण जानकारी

नवरात्रि (2018):- देवी अवतार और पूजा मंत्र सम्पूर्ण जानकारी 


 मां शैलपुत्री:- नवरात्रि (2018)


मां दुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री का है हिमालय की पुत्री होने के कारण यह शैलपुत्री कहलाती है नवरात्रि (2018) के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी पूजा की जाती है  भगवती के पहले स्वरूप को शास्त्रों में शैलपुत्री कहा गया है। माता सती पार्वती का ही रूप है माता सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यंग करवाया और उसमें सभी देवी देवताओं को बुलाया शंकर और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा जब यह पार्वती को पता चला तो वह भगवान शंकर के पास पहुंची और यज्ञ में जाने की इच्छा जाहिर की। शिव ने कहा कि बिना निमंत्रण के यज्ञ में नहीं जाना चाहिए। लेकिन माता सती की इच्छा के कारण भगवान शिव ने पार्वती को जाने की अनुमति दे दी। यह नवरात्रि (2018) का पहला पड़ाव था।
शैलपुत्री

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

मां दुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री का है हिमालय की पुत्री होने के कारण यह शैलपुत्री कहलाती है नवरात्रि (2018) के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी पूजा की जाती है
भगवती के पहले स्वरूप को शास्त्रों में शैलपुत्री कहा गया है। माता सती पार्वती का ही रूप है माता सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यंग करवाया और उसमें सभी देवी देवताओं को बुलाया शंकर और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा जब यह पार्वती को पता चला तो वह भगवान शंकर के पास पहुंची और यज्ञ में जाने की इच्छा जाहिर की। शिव ने कहा कि बिना निमंत्रण के यज्ञ में नहीं जाना चाहिए। लेकिन माता सती की इच्छा के कारण भगवान शिव ने पार्वती को जाने की अनुमति दे दी। यह नवरात्रि (2018) का पहला पड़ाव था।  जब वह अपने पिता राजा दक्ष के यहां पहुंची तो वहां परिजनों ने और किसी ने ठीक से उनसे बात तक नहीं की परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत कष्ट पहुंचा। यहां भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है।

दक्षिण में भगवान शंकर के प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे यह सब देखकर उनका हृदय क्षोभ प्लान और क्रोधित हो उठा। उन्होंने सोचा शंकर की बात ना मान बहुत बड़ी गलती की है माता सती अपने पति के इस अपमान को सह सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण बही जलाकर भस्म कर दिया। इस दुखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रोधित होकर अपने गणो को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णता विध्वंस करवा दिया। सती ने द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज की पत्ती के रूप में जन्म लिया इस बार वे शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। हेमवती भी उनका ही नाम है मां शैलपुत्री की आराधना से भक्तों को सर्वोच्च शिखर प्राप्त होता है शरीर में स्थित शक्ति जागृत होकर रोग शोक रुपी दैत्यों का विनाश करती है। दुर्गा के पहले स्वरूप में शैलपुत्री मानव के मन पर आधिपत्य रखती हैं जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने की शक्ति मां शैलपुत्री ही प्रदान करती हैं इनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में कमल का फूल रहता है उनका वाहन बैल है। उनका स्थान प्रत्येक प्राणी में नाभि चक्र से नीचे स्थित 'मूलाधार' चक्र को बताया गया है। यही वह स्थान है जहां आद्य शक्ति कुंडलिनी के रूप में रहती हैं। इसलिए नवरात्रि (2018) के प्रथम दिन देवी की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार के चक्कर में स्थिर करते हैं। पूर्व जन्म की भांति इस जन्म में भी शिव जी की ही अर्धांगिनी बनी। नवदुर्गा में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है।

मां ब्रह्मचारिणी:- नवरात्रि (2018)


ब्रह्मांड में चेतना का स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी के रूप में भक्तों को आशीष देता है। ब्रह्म का अर्थ वह परम चेतना है जिसका ना तो कोई आदि है और ना अंत। दूसरे दिन भक्त ध्यान मग्न होकर दिव्य अनुभूति मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं। मां के इस स्वरूप की आराधना करने वालों की शक्तियां अनंत हो जाती हैं
मां ब्रह्मचारिणी

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु विद्या  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

ब्रह्मांड में चेतना का स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी के रूप में भक्तों को आशीष देता है। ब्रह्म का अर्थ वह परम चेतना है। जिसका ना तो कोई आदि है और ना अंत। दूसरे दिन भक्त ध्यान मग्न होकर दिव्य अनुभूति मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं। मां के इस स्वरूप की आराधना करने वालों की शक्तियां अनंत हो जाती हैं। फलस्वरूप उसके दुख दूर होते हैं और परम सुखों को प्राप्त करता है। आनंद में ब्राह्मण की प्राप्ति कराना ही ब्रह्मचारिणी का स्वभाव है समान निर्मल कांतिमय और भक्ति रूप वाली दो भुजाओं वाली ब्रह्मचारिणी को कौमारी शक्ति का स्थान योगियों ने स्वाधिष्ठान चक्र में बताया है। एक हाथ में कमंडल दूसरे में चंदन की माला रहती है भक्तों को मां ब्रह्मचारिणी प्रत्येक काम में सफलता देती है बे मार्ग से कभी नहीं भटकते और जीवन के कठिन संघर्षों में भी अपने कर्तव्यों का पालन बिना विचलित हुए करते रहते हैं। इनका वाहन पर्वत की चोटी को बताया गया है। देवी दुर्गा का यह रूप साधकों को बल प्रदान करता है साधकों को यश सिद्धि और सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है। नवरात्रि (2018) में द्वितीय देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण जो दिल में है वह अनुरूप में लीन है देवी का मुख दिव्य तेज से भरा है। और भंगिमा शांत है विकट तपस्या के कारण अद्भुत तेज और अद्वितीय कांति का अनूठा संगम है तीनो लोक प्रकाशमान हो रहे ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त मां ब्रह्मचारिणी का व्रत करता है वह कभी भी अपने जीवन में नहीं भटकता और उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

मां चंद्रघंटा:- नवरात्रि (2018)


देवी चंद्रघंटा मन की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर भक्तों के भाग्य को समृद्ध करती हैं नवरात्रि (2018)) के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है चंद्र हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है।
देवी चंद्रघंटा

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु शक्ति  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

देवी चंद्रघंटा मन की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर भक्तों के भाग्य को समृद्ध करती हैं नवरात्रि (2018)) के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है चंद्र हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है। घंटे का अभिप्राय मंदिर में स्थित घंटा एवं उसकी ध्वनि कंपनी से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा है। अस्त-व्यस्त मानव मन जो विभिन्न विचारों भाव में उलझा रहता है मां चंद्रघंटा की आराधना कर सांसारिक कष्टों से मुक्ति पाकर देवी चेतना का साक्षात्कार करता है। इनके मस्तक पर घंटे का आकार का अर्धचंद्र है। इन के 10 हाथ हैं ,जिनमें एक हाथ में कमल का फूल, एक में कमंडल, एक में त्रिशूल, एक में गदा, एक में तलवार एक में, धनुष और एक में बाण, है। एक हाथ ह्रदय पर, एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा, में और एक अभय मुद्रा में रहता है। चंद्रघंटा का वाहन बाघ है। मां की आराधना से साधक में ना केवल साहस और निर्भयता का बल्कि सौम्यता और विनम्रता का भी विकास होता है। उनकी देर और स्वर में दिव्य कांति और मधुरता का समावेश हो जाता है उनके शरीर से तेज सा निकलता पड़ता है मां चंद्रघंटा जिस पर दृष्टि डालती हैं उन्हें अदभुत शांति और सुख का अनुभव होता है।

मां कूष्मांडा:- नवरात्रि (2018)


पवित्र और शुद्ध मन से :- नवरात्रि (2018) के चतुर्थ दिन मां कुष्मांडा की आराधना कर भक्त गण अपनी आंतरिक प्राणशक्ति को ऊर्जावान बनाते हैं। कूष्मांडा का अभिप्राय कद्दू से है। एक पूर्ण कलाकार व्रत की भांति मानव शरीर में स्थित प्राणशक्ति दिन रात सभी जीव जंतुओं का कल्याण करती है। बुद्धिमता और शक्ति की वृद्धि करती है।
मां कुष्मांडा



मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु तुस्टि  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

पवित्र और शुद्ध मन से  नवरात्रि (2018) के चतुर्थ दिन मां कुष्मांडा की आराधना कर भक्त गण अपनी आंतरिक प्राणशक्ति को ऊर्जावान बनाते हैं। कूष्मांडा का अभिप्राय कद्दू से है। एक पूर्ण कलाकार व्रत की भांति मानव शरीर में स्थित प्राणशक्ति दिन रात सभी जीव जंतुओं का कल्याण करती है। बुद्धिमता और शक्ति की वृद्धि करती है। 'कू' का अर्थ है छोटा ऊर्जा और 'अंड' का अर्थ है ब्रह्मांड गोला। धर्म ग्रंथों में मिलने वाले वर्णों के अनुसार अपनी हल्की सी मुस्कान मात्र से अंड को उत्पन्न करने वाली होने कारण ही इन्हें कूष्मांडा कहां गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था चारों और अंधकार ही अंधकार था तब कूष्मांडा देवी ने महाशून्य मैं अपने हाथ से उजाला करते हुए अंडे की उत्पत्ति की जो कि बीज रूप में तत्वों से मिला और ब्रह्मांड बना। इस प्रकार मां दुर्गा का यही अजन्मा और आज शक्ति रुप है जीवो में इनका स्थान 'अनाहतक चक्र' माना गया है। नवरात्र के चौथे दिन योग्यजन इसी चक्कर में अपना ध्यान लगाते हैं मां कूष्मांडा का निवास सूर्यलोक में है। कुछ लोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इनमें है इन के स्वरूप की क्रांति और तेज मंडल भी सूर्य के समान ही अतुलनीय है। कूष्माण्डा देवी की आठ भुजाएं हैं। जिनमें कमंडल, धनुष बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा, और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है इनका वाहन सिंह है और इन्हें आयुष और आरोपी की वृद्धि होती है। अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं मां के पूजन से प्रमोद की प्राप्ति हो सकती है।

मां स्कंदमाता:- नवरात्रि (2018)


नवरात्रि (2018) के 5 में दिन मां स्कंदमाता की आराधना करने से वक्त अपने व्यवहारिक ज्ञान को कर्म में परिवर्तित करते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इच्छा शक्ति , ज्ञान शक्ति और प्रिया शक्ति समागम है। जब ब्रह्मांड मैं व्याप्त शिव तत्व का मिलन होता है तो स्कंद का जन्म होता है। मां स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत आरंभ का प्रतीक मानी गई है। योगी जन इस दिन 'विशुद्ध चक्र' में अपना मन एकाग्र करते हैं स्कंद माता का स्थान है। स्कंदमाता का विग्रह चारभुजा वाला है यह अपनी गोद में भगवान स्कंद को बैठाये रखती हैं। दाहिनी और ऊपर वाली भुजा से धनुष बाण धारी, 6 मुख वाले बाल रूप स्कंध को पकड़े रहती हैं जबकि बाई और की ऊपर वाली भुजा दाता मुद्रा में रखती है। इनका वर्ण पूरी तरह निर्मल कांति वाला सफेद है यह कमलासन पर विराजत है वाहन के रूप में इन्होंने सिंह को अपनाया है कमलासन वाली स्कंदमाता को पद्मासन भी कहा जाता है। यह कोई शस्त्र धारण नहीं करती।
मां स्कंदमाता


मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु मातृ  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

 नवरात्रि (2018) के 5 में दिन मां स्कंदमाता की आराधना करने से वक्त अपने व्यवहारिक ज्ञान को कर्म में परिवर्तित करते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इच्छा शक्ति , ज्ञान शक्ति और प्रिया शक्ति समागम है। जब ब्रह्मांड मैं व्याप्त शिव तत्व का मिलन होता है तो स्कंद का जन्म होता है। मां स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत आरंभ का प्रतीक मानी गई है। योगी जन इस दिन 'विशुद्ध चक्र' में अपना मन एकाग्र करते हैं स्कंद माता का स्थान है। स्कंदमाता का विग्रह चारभुजा वाला है यह अपनी गोद में भगवान स्कंद को बैठाये रखती हैं। दाहिनी और ऊपर वाली भुजा से धनुष बाण धारी, 6 मुख वाले बाल रूप स्कंध को पकड़े रहती हैं जबकि बाई और की ऊपर वाली भुजा दाता मुद्रा में रखती है। इनका वर्ण पूरी तरह निर्मल कांति वाला सफेद है यह कमलासन पर विराजत है वाहन के रूप में इन्होंने सिंह को अपनाया है कमलासन वाली स्कंदमाता को पद्मासन भी कहा जाता है। यह कोई शस्त्र धारण नहीं करती।

मां कात्यायनी:- नवरात्रि (2018)


मां कात्यायनी दिव्यता के अती गुप्त रहस्य की प्रतीक है। नवरात्री के ६ वे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनका आभामंडल विभिन्न देवों के तेज से मिश्रित इंद्रधनुषी छटा देता है। प्राणियों में इनका का वास आज्ञा चक्र में होता है। और योग साधक इस दिन अपना ध्यान आज्ञा चक्र में लगाते हैं। माता कात्यायनी की एक भुजा अभय देने वाली मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा वर देने वाली मुद्रा में रहती है। ऊपर वाली भुजा में वे चंद्रहास खड़क धारण करती है जबकि नीचे वाली भुजा में कमल का फूल रहता है। कात्यानी देवी की उपासना करने वाला भक्त बड़ी सहजता से धर्म अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ ओं की प्राप्ति कर लेता है साधक को मां कात्यायनी दर्शन देकर कथा करती है।
मां कात्यायनी

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु स्मृति  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

मां कात्यायनी दिव्यता के अती गुप्त रहस्य की प्रतीक है। नवरात्री के ६ वे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनका आभामंडल विभिन्न देवों के तेज से मिश्रित इंद्रधनुषी छटा देता है। प्राणियों में इनका का वास आज्ञा चक्र में होता है। और योग साधक इस दिन अपना ध्यान आज्ञा चक्र में लगाते हैं। माता कात्यायनी की एक भुजा अभय देने वाली मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा वर देने वाली मुद्रा में रहती है। ऊपर वाली भुजा में वे चंद्रहास खड़क धारण करती है जबकि नीचे वाली भुजा में कमल का फूल रहता है। कात्यानी देवी की उपासना करने वाला भक्त बड़ी सहजता से धर्म अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ ओं की प्राप्ति कर लेता है साधक को मां कात्यायनी दर्शन देकर कथा करती है।


मां कालरात्रि:- नवरात्रि (2018)


नवरात्र के सप्तम दिन मां कालरात्रि की उपासना से प्रतिकूल ग्रहों द्वारा उत्पन्न की जाने वाली बाधाएं समाप्त होती है। जातक अग्नि जल जंतु शत्रु आदि के भय से मुक्त हो जाता है। मां कालरात्रि का रूप भयानक होने के बावजूद भी वह शुभ फल देने वाली देवी है। मां कालरात्रि नकारात्मक तामसी और राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश कर भक्तों को दानव दैत्य भूत प्रेत आदि से अभय प्रदान करती हैं। मां का यह रूप भक्तों को ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है घने अंधेरे की तरह एकदम गहरे काले रंग वाली सिर के बाल बिखरे रहने वाली माता के तीन नेत्र हैं। तथा इनके सांस से निकलती है।
मां कालरात्रि

मंत्र :- ऊँ  ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। 
नवरात्र के सप्तम दिन मां कालरात्रि की उपासना से प्रतिकूल ग्रहों द्वारा उत्पन्न की जाने वाली बाधाएं समाप्त होती है। जातक अग्नि जल जंतु शत्रु आदि के भय से मुक्त हो जाता है। मां कालरात्रि का रूप भयानक होने के बावजूद भी वह शुभ फल देने वाली देवी है। मां कालरात्रि नकारात्मक तामसी और राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश कर भक्तों को दानव दैत्य भूत प्रेत आदि से अभय प्रदान करती हैं। मां का यह रूप भक्तों को ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है घने अंधेरे की तरह एकदम गहरे काले रंग वाली सिर के बाल बिखरे रहने वाली माता के तीन नेत्र हैं। तथा इनके सांस से निकलती है। कालरात्रि मां दुर्गा का सातवा विग्रह स्वरूप है। इनके तीनो नेत्र ब्रह्मांड के गोले की तरह गोल है उनके गले में विद्युत जैसी हटा देने वाली सफेद माला सुशोभित रहती है इन के चार हाथ है मां कालरात्रि का स्वरूप भयानक है लेकिन भी भक्तों को सफल देती हैं। गधा है वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए हथियार भी रखती हैं। योगी साधकों द्वारा कालरात्रि का स्मरण सहस्त्र चक्र में ध्यान केंद्रित करके किया जाता है।

उनके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए राहत खोल देती है जी के पूजन से साधक के समस्त पाप धुल जाते हैं। और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मां कालरात्रि के चार हाथों में से दो हाथों में शस्त्र रहते हैं एक हाथ अभय मुद्रा में तथा एक वर मुद्रा में रहता है। मां का उप र का तन लाल रक्त में वस्तु से तथा नीचे का आधा भाग बाघ के चमड़ी से ढका रहता है। मां की भक्ति से दुष्टों का नाश होता है और गृह बाधाएं दूर हो जाती हैं।

मां महागौरी:- नवरात्रि (2018)


 नवरात्रि (2018) के आठवें दिन मां महागौरी की उपासना से वक्त के जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। और मार्ग से भटका हुआ जातक भी सन्मार्ग पर आ जाता है शक्ति रूप भक्तों को तुरंत और अमु फल देता है। भविष्य में पांच संताप निर्धनता दीनता और उसके पास नहीं भटकते इनकी कृपा से साधक सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुयों के अधिकारी हो जाता है।
मां महागौरी 

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

 नवरात्रि (2018) के आठवें दिन मां महागौरी की उपासना से वक्त के जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। और मार्ग से भटका हुआ जातक भी सन्मार्ग पर आ जाता है शक्ति रूप भक्तों को तुरंत और अमु फल देता है। भविष्य में पांच संताप निर्धनता दीनता और उसके पास नहीं भटकते इनकी कृपा से साधक सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुयों के अधिकारी हो जाता है।
कमल फूल चंद्र अथवा सूरत संघ जैसे निर्मल गौर वर्ण वाली महागौरी के समस्त भूषण और यहां तक कि इनका वाहन हिम के समान सफेद रंग वाला बैल माना गया है।इनकी चारभुज हैं। उनमें ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाली बाएं हाथ पर वर मुद्रा में रहती है। अमोघ और सत्य फल दायिनी है इनकी उपासना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

मां सिद्धिदात्री:- नवरात्रि (2018)


नवरात्रि (2018) के 9 वे दिन मां सिद्धिदात्री के पूजन अर्चन से भक्तों को जीवन में अद्भुत सिद्धि क्षमता प्राप्त होती है। जिनके फलस्वरूप पूर्णता के साथ सभी कार्य संपन्न होते हैं। माता दुर्गा अपने भक्तों को ब्रह्मांड की सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं देवी भागवत पुराण के अनुसार भगवान शिव ने भी इन्ही की कृपा से सिद्धियां को प्राप्त किया था।  कृपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ और वह लोक में अर्धनारीश्वर के रूप में स्थापित हुए।
मां सिद्धिदात्री

मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु सिद्धि  रूपेण संस्था,
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

नवरात्रि (2018) के 9 वे दिन मां सिद्धिदात्री के पूजन अर्चन से भक्तों को जीवन में अद्भुत सिद्धि क्षमता प्राप्त होती है। जिनके फलस्वरूप पूर्णता के साथ सभी कार्य संपन्न होते हैं। माता दुर्गा अपने भक्तों को ब्रह्मांड की सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं देवी भागवत पुराण के अनुसार भगवान शिव ने भी इन्ही की कृपा से सिद्धियां को प्राप्त किया था।  कृपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ और वह लोक में अर्धनारीश्वर के रूप में स्थापित हुए।

नवरात्रि (2018)  पूजन के अंतिम दिन भक्त और साधक माता सिद्धिदात्री की शास्त्रीय विधि विधान से पूजा करते हैं। हाथ में चक्र ऊपर वाले दाहिने हाथ में गदा रहती है। बाईं और के नीचे वाले हाथ में शंख तथा ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प रहता है। अगर एकाग्रता और निष्ठा से उनकी विधि से पूजा करे तो उसे सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। श्रष्टी मैं कुछ भी प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाता है। देवी ने अपना यह स्वरूप भक्तों पर अनुकंपा बरसाने के लिए धारण किया है।




Post a Comment